ग़ज़ल
प्यार मुहब्बत गर हसरत है, हमें प्यार बरसाना होगा |
नफरत करने वालों को बस, नफरत का फल खाना होगा ||
मेरी मौत है मुमकिन लेकिन, मानवता की ज़ात अमर है,
मेरे बाद भी इस दुनिया में, मेरा ये अफ़साना होगा ||
आज जिसे रौंदा है तूने, ये सच है कल उसका होगा,
शायद कल तेरी हस्ती के दम से जग बेगाना होगा ||
खुद को गगन समझने वाले, ज़र्रों की तौहीन न कर,
ढक देगा वो तुझे धूल से, गर तूफां को आना होगा ||
हक है तुमको, प्यार करो या नफरत बाँटो दुनिया में,
लेकिन, तुम जो दोगे वो ही दुनिया का नजराना होगा ||
लिखा गया है यही अभी तक , यही कहा और सूना गया,
प्यार बाँटने वाला अपना और दुश्मन बेगाना होगा ||
रचनाकार - अभय दीपराज
Monday, October 25, 2010
GHAZAL - 21
ग़ज़ल
अंजुली में ले के चलिये प्यार अमृत की तरह |
कीजिये न विकृत, मानवता को, विकृति की तरह ||
क्यों है तुमको...? आज भोली शक्ल से यूँ दुश्मनी,
दोस्त, ये तो शक्ल है एक दोस्त आकृति की तरह ||
राह पर चलना है अपना फ़र्ज़, ये करते रहो,
आप क्यूँ यूँ रुक गए हैं ? आज विस्मित की तरह ||
आप का विश्वास है यदि धर्म के अस्तित्व में,
इस लहर को आइये, फैलायें जागृति की तरह ||
भोग करने से बड़ा सुख, भोग बन जाने में है,
इसमें है एक अनवरत सुख, गूढ़ आवृति की तरह ||
रचनाकार - अभय दीपराज
अंजुली में ले के चलिये प्यार अमृत की तरह |
कीजिये न विकृत, मानवता को, विकृति की तरह ||
क्यों है तुमको...? आज भोली शक्ल से यूँ दुश्मनी,
दोस्त, ये तो शक्ल है एक दोस्त आकृति की तरह ||
राह पर चलना है अपना फ़र्ज़, ये करते रहो,
आप क्यूँ यूँ रुक गए हैं ? आज विस्मित की तरह ||
आप का विश्वास है यदि धर्म के अस्तित्व में,
इस लहर को आइये, फैलायें जागृति की तरह ||
भोग करने से बड़ा सुख, भोग बन जाने में है,
इसमें है एक अनवरत सुख, गूढ़ आवृति की तरह ||
रचनाकार - अभय दीपराज
Sunday, October 24, 2010
GHAZAL - 20
ग़ज़ल
ये दुनिया तुझको गम देगी, इंसान तुझे सहना होगा |
ये जो चाहे बनना होगा, ये जब चाहे ढहना होगा ||
ये जीवन तेरा या मेरा, तोहफा है दुनिया वालों का,
इसकी लहरों में खोकर ही, हरदम तुझको बहना होगा ||
है फ़र्ज़ तेरा उनको सुनना, ये ही बस तेरी नियति है,
दुनिया तो बस वो बोलेगी, जो भी उसको कहना होगा ||
एक झूठ गुमां है तेरा ये, तू गर खुद को आज़ाद कहे,
तू एक रहन है रिश्तों में, बँधकर तुझको रहना होगा ||
जीने की सच्ची राह यही, हर गम को तू एक दीप बना,
तू दुनिया की खातिर मिटकर ही, दुनिया का गहना होगा ||
रचनाकार - अभय दीपराज
ये दुनिया तुझको गम देगी, इंसान तुझे सहना होगा |
ये जो चाहे बनना होगा, ये जब चाहे ढहना होगा ||
ये जीवन तेरा या मेरा, तोहफा है दुनिया वालों का,
इसकी लहरों में खोकर ही, हरदम तुझको बहना होगा ||
है फ़र्ज़ तेरा उनको सुनना, ये ही बस तेरी नियति है,
दुनिया तो बस वो बोलेगी, जो भी उसको कहना होगा ||
एक झूठ गुमां है तेरा ये, तू गर खुद को आज़ाद कहे,
तू एक रहन है रिश्तों में, बँधकर तुझको रहना होगा ||
जीने की सच्ची राह यही, हर गम को तू एक दीप बना,
तू दुनिया की खातिर मिटकर ही, दुनिया का गहना होगा ||
रचनाकार - अभय दीपराज
GHAZAL - 19
ग़ज़ल
एक पेड़ के पत्ते-पते, आपस में ही झगड़ रहे हैं |
पागल अपने ही विनाश के, पथ को बढ़ कर पकड़ रहे हैं ||
सब अपनी-अपनी टहनी को, अपना-अपना कह-कह कर,
पगले जड़ को अनदेखा कर, अपनी मौत को जकड रहे हैं ||
जिस आश्रय पर जीवन इनका, टिका हुआ और फूल रहा है,
मूरख उसको काट रहे है, और बुद्धि पर अकड़ रहे हैं ||
बौराए इन बेचारों की, अक्ल देख रोना आता है,
आग हाथ पर सुलगाने को, ये हथेलियाँ रगड़ रहे हैं ||
मित्रों, ये फ़रियाद मेरी तुम, सुन लो, इस विप्लव को रोको,
ये बादल हैं महाप्रलय के, जो जग पर यूँ घुमड़ रहे हैं ||
रचनाकार- अभय दीपराज
एक पेड़ के पत्ते-पते, आपस में ही झगड़ रहे हैं |
पागल अपने ही विनाश के, पथ को बढ़ कर पकड़ रहे हैं ||
सब अपनी-अपनी टहनी को, अपना-अपना कह-कह कर,
पगले जड़ को अनदेखा कर, अपनी मौत को जकड रहे हैं ||
जिस आश्रय पर जीवन इनका, टिका हुआ और फूल रहा है,
मूरख उसको काट रहे है, और बुद्धि पर अकड़ रहे हैं ||
बौराए इन बेचारों की, अक्ल देख रोना आता है,
आग हाथ पर सुलगाने को, ये हथेलियाँ रगड़ रहे हैं ||
मित्रों, ये फ़रियाद मेरी तुम, सुन लो, इस विप्लव को रोको,
ये बादल हैं महाप्रलय के, जो जग पर यूँ घुमड़ रहे हैं ||
रचनाकार- अभय दीपराज
GHAZAL - 18
ग़ज़ल
खून में डूबा है इन्सां, हाथ में तलवार है |
एक पागलघर बना यूँ, आज का संसार है ||
धर्म का ये अर्थ है अब, है ये मज़हब की नज़र,
ये तो अब गद्दी नशीनी के लिए हथियार है ||
आज हम औलाद पैदा कर रहे हैं, इसलिए -
क्योंकि - ये रंगीन दुनिया, माँस का बाज़ार है ||
पेट भरने के लिए हैं, आज रिश्तेदारियाँ,
हर कोई रिश्ता यहाँ पर, आज एक व्यापार है ||
मैं भी हूँ शायद फरेबी, और फरेबी आप हैं,
झूठ है ये- मुझको तुमसे, तुमको मुझसे प्यार है ||
जा रही है ये नज़र, इस छोर से, जिस छोर तक,
भूल कर कर्त्तव्य, सबको याद बस, अधिकार है ||
आज आदम गर कहीं तू है ? तो आकर देख ले,
क्या तेरे अरमान थे ? और क्या तेरा परिवार है ||
रचनाकार - अभय दीपराज
खून में डूबा है इन्सां, हाथ में तलवार है |
एक पागलघर बना यूँ, आज का संसार है ||
धर्म का ये अर्थ है अब, है ये मज़हब की नज़र,
ये तो अब गद्दी नशीनी के लिए हथियार है ||
आज हम औलाद पैदा कर रहे हैं, इसलिए -
क्योंकि - ये रंगीन दुनिया, माँस का बाज़ार है ||
पेट भरने के लिए हैं, आज रिश्तेदारियाँ,
हर कोई रिश्ता यहाँ पर, आज एक व्यापार है ||
मैं भी हूँ शायद फरेबी, और फरेबी आप हैं,
झूठ है ये- मुझको तुमसे, तुमको मुझसे प्यार है ||
जा रही है ये नज़र, इस छोर से, जिस छोर तक,
भूल कर कर्त्तव्य, सबको याद बस, अधिकार है ||
आज आदम गर कहीं तू है ? तो आकर देख ले,
क्या तेरे अरमान थे ? और क्या तेरा परिवार है ||
रचनाकार - अभय दीपराज
GHAZAL - 17
ग़ज़ल
आओ, फिर आवाज़ दें हम, धर्म के पुरुषार्थ को |
फिर से धरती पर बुलायें, सत्य को, परमार्थ को ||
आज धरती पर ग्रहण है, पाप और अन्याय का,
आओ फिर दिल से पुकारें, कृष्ण को और पार्थ को ||
रात भर का है अन्धेरा, पाप का साम्राज्य ये ,
याद रख्खो, मत भुलाओ, इस अमर शास्त्रार्थ को ||
हम मनुज हैं और मनुज रहना हमारा धर्म है,
आओ, हम विश्वास से, दोहरायें इस भावार्थ को ||
मत कहो, ये धर्म और ये सत्य अब निःसार है,
आत्माओं में उतारें, आओ, इस दिव्यार्थ को ||
विश्व के कल्याण की, आओ, करें हम कामना,
आओ, होली में जला दें, पाप को और स्वार्थ को ||
जाग जाये यदि मनुजता, विश्व ये कुंदन बने,
आओ गायें, मिल के इस पावन-अमर चरितार्थ को ||
रचनाकार - अभय दीपराज
आओ, फिर आवाज़ दें हम, धर्म के पुरुषार्थ को |
फिर से धरती पर बुलायें, सत्य को, परमार्थ को ||
आज धरती पर ग्रहण है, पाप और अन्याय का,
आओ फिर दिल से पुकारें, कृष्ण को और पार्थ को ||
रात भर का है अन्धेरा, पाप का साम्राज्य ये ,
याद रख्खो, मत भुलाओ, इस अमर शास्त्रार्थ को ||
हम मनुज हैं और मनुज रहना हमारा धर्म है,
आओ, हम विश्वास से, दोहरायें इस भावार्थ को ||
मत कहो, ये धर्म और ये सत्य अब निःसार है,
आत्माओं में उतारें, आओ, इस दिव्यार्थ को ||
विश्व के कल्याण की, आओ, करें हम कामना,
आओ, होली में जला दें, पाप को और स्वार्थ को ||
जाग जाये यदि मनुजता, विश्व ये कुंदन बने,
आओ गायें, मिल के इस पावन-अमर चरितार्थ को ||
रचनाकार - अभय दीपराज
Saturday, October 23, 2010
GHAZAL - 16
ग़ज़ल
आज शान से इस दुनिया में, खोटा सिक्का ही चलता है |
आस्तीन का साँप यहाँ जो बन ले, दुनिया में पलता है ||
गलत मुकद्दमा हो तो प्यारे, एक मिनिट में निपट जाएगा,
सच की होंगी सौ तारीखें, यहाँ फैसला यूँ टलता है ||
बाग़ सुगन्धित मीठे फल के, सड़ा खाद पाकर फलते है,
साफ़-सफाई से तो प्यारे, बाग़ सूखता और जलता है ||
क्या राजा, क्या प्रजा, सभी को, प्यार यहाँ है अपने हित से,
जो मूरख परहित की सोचे, व्यर्थ झुलसता और गलता है ||
दानव जीते यहाँ शान से, मानवता है विकृति - गरीबी,
सीधा - सच्चा बनकर जीना, दुनिया में सबको खलता है ||
स्त्रोत प्यार के सूख गए है, फूल यहाँ मसले जाते है,
आज ज़माना उसका है जो पत्थर बनकर के घलता है ||
दर्द बना जीवन मानव का, आँसू हैं उसकी आँखों में,
युग ने ऐसी करवट ली है, कण-कण मानव को छलता है ||
रचनाकार - अभय दीपराज
आज शान से इस दुनिया में, खोटा सिक्का ही चलता है |
आस्तीन का साँप यहाँ जो बन ले, दुनिया में पलता है ||
गलत मुकद्दमा हो तो प्यारे, एक मिनिट में निपट जाएगा,
सच की होंगी सौ तारीखें, यहाँ फैसला यूँ टलता है ||
बाग़ सुगन्धित मीठे फल के, सड़ा खाद पाकर फलते है,
साफ़-सफाई से तो प्यारे, बाग़ सूखता और जलता है ||
क्या राजा, क्या प्रजा, सभी को, प्यार यहाँ है अपने हित से,
जो मूरख परहित की सोचे, व्यर्थ झुलसता और गलता है ||
दानव जीते यहाँ शान से, मानवता है विकृति - गरीबी,
सीधा - सच्चा बनकर जीना, दुनिया में सबको खलता है ||
स्त्रोत प्यार के सूख गए है, फूल यहाँ मसले जाते है,
आज ज़माना उसका है जो पत्थर बनकर के घलता है ||
दर्द बना जीवन मानव का, आँसू हैं उसकी आँखों में,
युग ने ऐसी करवट ली है, कण-कण मानव को छलता है ||
रचनाकार - अभय दीपराज
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