Wednesday, October 27, 2010

GHAZAL - 29

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GHAZAL - 28

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GHAZAL - 27

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GHAZAL - 26

ग़ज़ल

दोस्तों, फिर आदमीयत को, ज़रा आवाज़ दो |
गीत एक तुम भी उठा लो, मुझको भी एक साज़ दो ||

माँ बुलाती है हमें फिर , अपनी रक्षा के लिये,
फिर से अपनी शक्ति को तुम, एक नया परवाज़ दो ||

धर्म ने फिर से पिता बनकर, पुकारा है हमें,
आओ, इसके माँ को फिर, माँ का अंदाज़ दो ||

डस रहा है आजकल, अन्याय जग में न्याय को,
न्याय की उजली सुबह को, फिर नया आगाज़ दो ||

फ़र्ज़ के फरमान से हम, बे-खबर हैं आजकल,
फ़र्ज़ को फिर से पुकारो, और उसे फिर ताज दो ||

आजकल अधिकार का, हमको नशा सा हो गया,
इस ज़हर को अब न ज़्यादा, और ज़्यादा नाज़ दो ||

आदमी हैं हम, हमारी राह है- इन्सानियत,
आज के इस वक़्त को फिर, ये दिशाएँ आज दो ||
रचनाकार - अभय दीपराज

Monday, October 25, 2010

GHAZAL - 25

                ग़ज़ल

सोचते   थे   ज़माना    सँभल   जायेगा |
वक़्त  के  साथ  इन्सां   बदल   जायेगा ||

आग   चारों   तरफ   यूँ   बरसने   लगी,
लग  रहा  है  ज़हां  सारा  जल  जायेगा  ||

खो  गया  आदमी,  आदमीयत  है  गुम,
नाम  बाकी  है  जो  हमको छल जायेगा ||

दाग  है,  दाग  है,  दाग  है,  हर  कशिश,
एक  ज़हर  है  जो  साँसों में पल जायेगा ||

देखकर  ये  समां,  रो  रहा साज़ -ए-दिल,

न खबर थी क़ि- कल सा न कल आयेगा ||
     
       रचनाकार - अभय दीपराज

GHAZAL - 24

     ग़ज़ल - 24

आजकल धनवान ही भगवान् है |
जानवर, धन के बिना, इंसान है ||

खूबियाँ अब और कोई कुछ नहीं,
देव बनकर पूज रहा, धनवान है ||

बिक रहा है न्याय भी, बाज़ार में,
जितना धन है पास, उतना मान है ||

अक्ल की ताक़त यहाँ अब कुछ नहीं,
पैसे वाला,   मूर्ख भी,  विद्वान् है ||

रो रहा अब ज्ञान का साधक यहाँ,
धन से शासन कर रहा अज्ञान है ||

जल रहा है भूख से और धूप से,
आदमीयत पर जिसे, अभिमान है ||

धन बना है धर्म और आराध्य अब,
धर्म सहता हर घड़ी, अपमान है ||

आज युग गाता है केवल मंत्र ये -
आज धन ही ज्ञान और सम्मान है ||

रचनाकार- अभय दीपराज

GHAZAL - 23

                  ग़ज़ल

प्यार  जताकर  धोखा  देना अब  जग  का  दस्तूर है |
पाक जिगर  इन्सां दुनिया  में अब बेहद  मजबूर  है ||

आस्तीन  में  छुरा  छिपाये, चहरे  पर मुस्कान लिये,
बद्जातों   और   गद्दारों   से   हर  कोना    भरपूर  है ||

अधिकारों  की  ताक़त  रखने वालों का मल चाट रहे,
मानवता  मर  गयी,  स्वार्थ से घृणित आत्मा चूर है ||

विष से ज़्यादा हुआ विषैला अमृत  अब  विश्वास का,
धूर्त  और  मक्कारों  का  सिर  आज बहुत मगरूर है ||

हर  रिश्ते  का  सौदा करना अब रिश्तों का धर्म हुआ,
सत्य - धर्म से  मानवता  की  आत्मा  अब  यूँ दूर है ||

मृत्यु दंड का पुरस्कार है, धर्म - सत्य के पथिकों को,
जीवन  उसका  है -  अधर्म  को नमन जिसे मंज़ूर है
||
                   
                   रचनाकार - अभय दीपराज