अभय कान्त झा दीपराज के मैथिली ग़ज़ल -
ग़ज़ल
मोन प्रपंच पाप सँ दूषित, भाषण जन - समुदाय के |
कोना एहन नायक समाज में, परचम बनता न्याय के ||
कथनी में आदर्श, कलंकित करनी सँ नफरत के पात्र,
कोना समाज एहन व्यक्ति के, शत्रु कहय अन्याय के ||
किछु दिन संभव अछि चालाकी किन्तु अंत नहिं नीक एकर,
सदा अंत में हारव निश्चित, दानव के पर्याय के ||
धर्म, सत्य और न्याय-मनुजता, नैं हारल, नैं हारि सकत,
झूठ नैं कखनों बना सकत क्यों, अपन सबहक ऐहि राय के ||
धर्म अपन अछि - अपना कारण अपन वंश के मान बढय,
कहि नैं पावय क्यों कपूत के जननी अपना माय के ||
आदर्शक पथ पकडि चलू और करैत रहू कर्त्तव्य अपन,
लक्ष्य इहय बस सर्वोत्तम अछि, बुझू हमर अभिप्राय के ||
रचनाकार - अभय दीपराज
Friday, March 18, 2011
Sunday, November 7, 2010
Friday, November 5, 2010
GHAZAL - 70
vHk; dkUr >k nhijkt
,e-,l&lh-] ,e-,-] ch-,M-] ,y&,y-ch-
xzke o iksLV& lIrk]
ftyk& e/kqcuh] jkT;& fcgkj]
fiu& І‰„ƒƒ nwjHkk’k& 09893101237
&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&
x+t+y
gj jkst i;kes&I;kj feyk] gj jkst ;s liuk VwV x;kA
gj jkst dksbZ gejkt+ feyk ij dy dk viuk VwV x;kAA
oks Hkwy x;k gksxk “kk;n] esjh bl Hkksyh lwjr dks]
/kks[kk gh gqvk gksxk mldks] ;s fny tks viuk VwV x;kAA
,d iy dh fux+gckuh Hkh dHkh] vglku cgqr Fkk esjs fy;s]
eSa [kq”k gw¡ yqVkdj ;w¡ [k+qn dks] dksbZ ehr gh viuk ywV x;kA
mlus Hkh ;gh nkos Hksts & igpku fy;k gS eSaus rqEgsa]
ij uhan [kqyh rks Bsl yxh] oks jaxha liuk VwV x;kAA
[kks;s gksrs x+j jkgksa esa] fny viuk le>k ysrs ge]
ysfd+u vius gh ?kj esa ge] [kks;s] ?kj gels :B x;kAA
vkgksa ds /kq;sa esa Mwck gS fny] dkSu \ c¡/kk;s vk”k gesa]
fny us ;w¡ t+[e mBk;s gSa] nkeu [+kqf”k;ksa dk NwV x;kA
jpukdkj& vHk; nhijkt
GHAZAL - 69
vHk; dkUr >k nhijkt
,e-,l&lh-] ,e-,-] ch-,M-] ,y&,y-ch-
xzke o iksLV& lIrk]
ftyk& e/kqcuh] jkT;& fcgkj]
fiu& І‰„ƒƒ nwjHkk’k& 09893101237
&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&
x+t+y
Tk+[+e x+Sjksa ds lgs vkSj dg lds dqN ge ughaA
Rkks] nksLrksa ds uke ij Hkh ,d I;kyk xe lghAA
Fkha gljrsa] feVrh jgha] Fkk [+kwu] rks tyrk jgk (
nwj ckgksa ls exj] Fks jkg esa ge] de ughaAA
viuh&viuh fQrjrsa Fkha] D;k oQ+k ;k D;k tQ+k (
ywVus okyk lgh oks] yqVus okys ge lghAA
;k [kqnk ! mldk Hkyk gks] bd lgkjk tks jgk (
ft+anxh rks dV x;h] x+ex+ha jgs] ;s xe ughaAA
oks lqcg xqt+jh] <yh oks “kke] vc ;s “kc+ lgh (
oD+r dy dk D;k irk] oks gksa dgk¡ vkSj ge dghaAA
jpukdkj& vHk; nhijkt
GHAZAL - 68
ग़ज़ल
कब तक जियेंगे ? दाग से लड़ते हुए ये लोग |
पागल हुये हैं दर्द को सहते हुये ये लोग ||
दिल को दिया है धोखा और मुस्कुरा लिये,
बू से भरी लहर में बहते हुये ये लोग ||
कितने हैं ये बहादुर...? जो खुद से लड़ रहे,
खुले आसमां के नीचे रहते हुये ये लोग ||
ज़िल्लत की राह चुनकर, उसे छोड़ते नहीं,
इज्ज़त बहुत बड़ी है, कहते हुये ये लोग ||
खण्डहर नहीं है मानते ये खुद को आज तक.
पानी से और हवा से ढहते हुये ये लोग ||
रचनाकार - अभय दीपराज
कब तक जियेंगे ? दाग से लड़ते हुए ये लोग |
पागल हुये हैं दर्द को सहते हुये ये लोग ||
दिल को दिया है धोखा और मुस्कुरा लिये,
बू से भरी लहर में बहते हुये ये लोग ||
कितने हैं ये बहादुर...? जो खुद से लड़ रहे,
खुले आसमां के नीचे रहते हुये ये लोग ||
ज़िल्लत की राह चुनकर, उसे छोड़ते नहीं,
इज्ज़त बहुत बड़ी है, कहते हुये ये लोग ||
खण्डहर नहीं है मानते ये खुद को आज तक.
पानी से और हवा से ढहते हुये ये लोग ||
रचनाकार - अभय दीपराज
GHAZAL - 67
ग़ज़ल
प्यार जब लुट गया ज़माने में |
हो कशिश किस तरह ? फ़साने में ||
मज़हब-ए-दिल का अब ये मज़हब है,
है सुकूं फूल को सताने में ||
जिसकी उम्मीद थी न हसरत है,
है वही मोड़ अब फ़साने में ||
बे-वफाई भी होशमंदी है,
बच सके कुछ अगर न जाने में ||
जो हुयी भूल वो हुयी क्यूँ कर,
दम नहीं कोई इस बहाने में ||
लुट गया जो, न लौट पायेगा,
देख क्या रह गया खजाने में ||
रचनाकार - अभय दीपराज

हो कशिश किस तरह ? फ़साने में ||
मज़हब-ए-दिल का अब ये मज़हब है,
है सुकूं फूल को सताने में ||
जिसकी उम्मीद थी न हसरत है,
है वही मोड़ अब फ़साने में ||
बे-वफाई भी होशमंदी है,
बच सके कुछ अगर न जाने में ||
जो हुयी भूल वो हुयी क्यूँ कर,
दम नहीं कोई इस बहाने में ||
लुट गया जो, न लौट पायेगा,
देख क्या रह गया खजाने में ||
रचनाकार - अभय दीपराज
GHAZAL - 66
vHk; dkUr >k nhijkt
,e-,l&lh-] ,e-,-] ch-,M-] ,y&,y-ch-
xzke o iksLV& lIrk]
ftyk& e/kqcuh] jkT;& fcgkj]
fiu& І‰„ƒƒ nwjHkk’k& 09893101237
&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&
x+t+y
nksLrh dk okLrk nsdj ds xnZu dkV yksA
/keZ vc ;s cu x;k gS& Fkwd dj ds pkV yksAA
dks’k ij fey tk; ;fn rqedks dHkh dCt+k dgha]
mldks viuk isV Hkj dj] vius ?kj esa ck¡V yksAA
Qsad nks ;s /keZ vkSj bUlkfu;r ds phFkM+s]
ftldh i”kqrk pkfg;s gks] [kky mldh Nk¡V yksAA
vkneh cudj ds thuk] jksx lk gS vktdy]
vkvks ! cu tkvks nfjans] BkB ds lkS ckV yksAA
Qsad nks ;s /keZ vkSj fl)kUr dh lc iqLrdsa]
Qwyksa ds fcLrj pquks] rqe Hkh u uaxh [kkV yksAA
gj fdlh I;kls dh et+cwjh dk ysdj Q+k;nk]
[kwu pwlks] blfy;s dCt+s esa lkjs ?kkV yksAA
rqedks Hkh rks flYd vkSj js”ke iguuk pkfg;s]
cnyks&cnyks] vc u vius okLrs ;s VkV yksAA
jpukdkj& vHk; nhijkt
Subscribe to:
Posts (Atom)