Thursday, September 29, 2011

अभय कान्त झा दीपराज के मैथिली गीत -


बड़भागी हम मिथिलावासी.......


बड़भागी हम मिथिलावासी. एहि धरती सन माय कतय |
जेहि आँगन जगदम्बा बेटी, पाहुन राम जमाय जतय ||

पग - पग पोखरि, पान - मखानक और धानक भण्डार भरल |
गंगा - गंडक, कमला - कोसी, अमृत सन जलधार भरल ||
बुद्धि - विवेक, ज्ञान और बल के, परचम नित फहराय जतय |
जेहि आँगन जगदम्बा बेटी, पाहुन राम जमाय जतय ||१||

कालीदास, मदन, विद्यापति, मंडन और अयाचिक धाम | 
एहि आँगन में उगना भोला, एहि आँगन चाणक्य ललाम || 
गौतम-कपिल-जनक के तप बल, छाया बनिकय छाय जतय |
बड़भागी हम मिथिलावासी. एहि धरती सन माय कतय ||२|| 

सादा - सरल - सरस - शुचि भोजन, चूड़ा-दही, साग और भात |
मज्जन-पूजन, संध्या वंदन, नैतिक-चिंतन, सबहक बात ||
पावन और पवित्र मानवता, नित-प्रतिदिन अधिकाय जतय | 
जेहि आँगन जगदम्बा बेटी, पाहुन राम जमाय जतय ||३||

धर्मक - धुरी धरा मिथिला के, सभ्य समाजक ई सिरमौर |
करब प्रयास सदा हम सब ई- एहि के गौरव बढ़य और ||
धर्म नैं कहियो जाय एतय सँ, पाप नष्ट भय जाय जतय | 
बड़भागी हम मिथिलावासी. एहि धरती सन माय कतय ||४||

बड़भागी हम मिथिलावासी. एहि धरती सन माय कतय |
जेहि आँगन जगदम्बा बेटी, पाहुन राम जमाय जतय ||


               रचनाकार - अभय दीपराज

अभय कान्त झा दीपराज के मैथिली गीत -


बड़भागी हम मिथिलावासी........
बड़भागी हम मिथिलावासी. एहि धरती सन माय कतय |
जेहि आँगन जगदम्बा बेटी, पाहुन राम जमाय जतय ||

पग - पग पोखरि, पान - मखानक और धानक भण्डार भरल |
गंगा - गंडक, कमला - कोसी, अमृत सन जलधार भरल ||
बुद्धि - विवेक, ज्ञान और बल के, परचम नित फहराय जतय |
जेहि आँगन जगदम्बा बेटी, पाहुन राम जमाय जतय ||१||

कालीदास, मदन, विद्यापति, मंडन और अयाचिक धाम |
एहि आँगन में उगना भोला, एहि आँगन चाणक्य ललाम ||
गौतम-कपिल-जनक के तप बल, छाया बनिकय छाय जतय |
बड़भागी हम मिथिलावासी. एहि धरती सन माय कतय ||२||

सादा - सरल - सरस - शुचि भोजन, चूड़ा-दही, साग और भात |
मज्जन-पूजन, संध्या वंदन, नैतिक-चिंतन, सबहक बात ||
पावन और पवित्र मानवता, नित-प्रतिदिन अधिकाय जतय |
जेहि आँगन जगदम्बा बेटी, पाहुन राम जमाय जतय ||३||

धर्मक - धुरी धरा मिथिला के, सभ्य समाजक ई सिरमौर |
करब प्रयास सदा हम सब ई- एहि के गौरव बढ़य और ||
धर्म नैं कहियो जाय एतय सँ, पाप नष्ट भय जाय जतय |
बड़भागी हम मिथिलावासी. एहि धरती सन माय कतय ||४||

बड़भागी हम मिथिलावासी. एहि धरती सन माय कतय |
जेहि आँगन जगदम्बा बेटी, पाहुन राम जमाय जतय ||

रचनाकार - अभय दीपराज

Monday, May 9, 2011

Wednesday, May 4, 2011

Ghazal -26

                      ग़ज़ल

दोस्तों,   फिर   आदमीयत  को,  ज़रा  आवाज़  दो |
गीत एक तुम भी उठा लो, मुझको भी एक साज़ दो ||

माँ  बुलाती  है  हमें  फिर ,  अपनी  रक्षा  के  लिये,
फिर से अपनी शक्ति को तुम,  एक नया परवाज़ दो ||

धर्म  ने  फिर  से  पि
ता  बनकर,   पुकारा  है   हमें,
आओ,  इसके  माँ  को  फिर,   माँ  का  अंदाज़  दो ||

डस रहा है आजकल,  अन्याय  जग  में  न्याय को,
न्याय की उजली सुबह  को,  फिर नया आगाज़ दो ||

फ़र्ज़  के  फरमान  से  हम,  बे-खबर  हैं  आजकल,
फ़र्ज़  को  फिर  से  पुकारो,  और उसे फिर ताज दो ||

आजकल अधिकार का,  हमको  नशा  सा हो गया,
इस  ज़हर  को अब न ज़्यादा, और ज़्यादा नाज़ दो ||

आदमी   हैं   हम,   हमारी  राह  है-   इन्सानियत,
आज  के  इस  वक़्त  को  फिर, ये दिशाएँ आज दो ||
                 रचनाकार - अभय दीपराज

Monday, March 21, 2011

अभय कान्त झा दीपराज के मैथिली गीत -

अभय कान्त झा दीपराज के मैथिली गीत -५-
  बेटी   के   दहेज़  के भार ..............
बनल   असह्य   संताप   समाजक,   बेटी   के   दहेज़  के भार |
भैया - बाबू   गोर   लगैत   छी,    बंद    करू    ई    अत्याचार ||

जे     बेटी     जननी    समाज    के,    मूल    प्रेम - स्नेह    के |
अपमानक   हम   पातक   लैत   छी,   ओहि  बेटी  के  देह  के ||

अपन   मान   सँ  हम   अविवेकी,  अपने  कयलौं   दुर्व्यवहार |
भैया - बाबू   गोर   लगैत   छी,    बंद    करू    ई    अत्याचार || १ ||

बड़  ज्ञानी,  बड़  शिष्टाचारी,  मानव  बनि   हम   जन्म   लेलौं |
नीति - न्याय  के  परिभाषा  हम  कयलौं,  बड़  सद्कर्म केलों ||
सब   यश   पर   भारी   ई अपयश,  संतानक  कयलौं व्यापार |
भैया - बाबू   गोर   लगैत   छी,    बंद    करू    ई    अत्याचार || २ ||

जेहि   बेटी   में   दुर्गा - कमला   और   सीता   के   वास  अहि |
ओ   बेटी   अपना   नैहर   पर   बोझ   बनल,   उपहास   अहि ||
एहन  पातकी - पापी  छी  हम,  हाँ,  एहि पातक पर धिक्कार |
भैया - बाबू   गोर   लगैत   छी,    बंद    करू    ई    अत्याचार || ३ ||

बेटी   के   अपमानक   ई   विष,   उपटा   देलक   जों  ई  फूल |
हमर - अहाँ  के,  सबहक  आँगन  में  नाचत  विनाश के शूल ||
संकट  ई  गंभीर  भेल  अब,  करिऔ  एहि  पर  तुरत  विचार |
भैया - बाबू   गोर   लगैत   छी,    बंद    करू    ई    अत्याचार || ४ ||

आइ अगर ई व्यथा हमर अछि,  काल्हि अहाँ के  ई अभिशाप |
एक - एक कय पेरि रहल अछि,  सबके  एहि  ज्वाला के दाप ||
सबहक गर्दन, शान्ति और सुख, काटि रहल अछि ई तलवार
|
भैया - बाबू   गोर   लगैत   छी,    बंद    करू    ई  अत्याचार || ५ ||

बनल   असह्य   संताप   समाजक,   बेटी   के   दहेज़  के भार |
भैया - बाबू   गोर   लगैत   छी,    बंद    करू    ई    अत्याचार ||

                                रचनाकार- अभय दीपराज  

Friday, March 18, 2011

अभय कान्त झा दीपराज के मैथिली ग़ज़ल -
                         ग़ज़ल
मोन  प्रपंच  पाप  सँ  दूषित,  भाषण   जन - समुदाय   के |
कोना  एहन  नायक  समाज  में,  परचम  बनता न्याय के ||

कथनी  में  आदर्श,  कलंकित  करनी  सँ  नफरत  के  पात्र,
कोना  समाज  एहन  व्यक्ति  के,  शत्रु  कहय  अन्याय   के ||

किछु दिन संभव अछि चालाकी किन्तु अंत नहिं नीक एकर,
सदा अंत   में   हारव   निश्चित,   दानव   के   पर्याय   के ||

धर्म, सत्य  और  न्याय-मनुजता,  नैं हारल, नैं हारि सकत,
झूठ नैं कखनों बना सकत क्यों, अपन सबहक ऐहि राय के ||

धर्म  अपन  अछि - अपना कारण अपन वंश के मान बढय,
कहि   नैं  पावय  क्यों  कपूत  के  जननी  अपना  माय  के ||

आदर्शक  पथ  पकडि 
चलू   और  करैत  रहू कर्त्तव्य अपन,
लक्ष्य  इहय  बस  सर्वोत्तम  अछि,  बुझू हमर अभिप्राय के ||
                          रचनाकार - अभय दीपराज