Saturday, October 23, 2010

GHAZAL - 16

                            ग़ज़ल

आज  शान  से  इस  दुनिया  में, खोटा सिक्का ही चलता है |
आस्तीन  का  साँप  यहाँ  जो  बन  ले,  दुनिया में पलता है ||

गलत मुकद्दमा हो तो प्यारे, एक मिनिट में निपट जाएगा,
सच  की  होंगी  सौ  तारीखें,  यहाँ   फैसला   यूँ   टलता   है ||

बाग़  सुगन्धित  मीठे  फल  के,  सड़ा खाद पाकर फलते है,
साफ़-सफाई  से  तो  प्यारे,  बाग़  सूखता  और  जलता  है ||

क्या राजा, क्या प्रजा, सभी को, प्यार यहाँ है अपने हित से,
जो  मूरख  परहित की सोचे, व्यर्थ झुलसता और गलता है ||

दानव  जीते  यहाँ  शान  से,  मानवता  है  विकृति - गरीबी,
सीधा - सच्चा  बनकर  जीना,  दुनिया में सबको खलता है ||

स्त्रोत  प्यार  के  सूख  गए  है,  फूल  यहाँ  मसले  जाते  है,
आज  ज़माना  उसका  है  जो  पत्थर  बनकर के घलता है ||


दर्द  बना  जीवन  मानव  का,  आँसू  हैं  उसकी  आँखों  में,
युग  ने  ऐसी करवट ली है, कण-कण मानव को छलता है ||


                         रचनाकार - अभय दीपराज

Friday, October 22, 2010

GHAZAL - 15

            ग़ज़ल

हर  तरफ  अब  विनाश  है यारो |
आज   हर   घर  उदास  है  यारो ||

रौशनी   है   मगर   अन्धेरा   है,
इतना  धुँधला  प्रकाश  है  यारो  ||

आदमी  जानवर  बना   है   अब,
जाने ये क्या विकास...? है यारो ||

हर  तरफ  मौत  का है, सन्नाटा,
हर  तरफ   लाश-लाश  है  यारो ||

हम वहाँ जा रहे हैं जिस पथ पर,
एक प्रलय का  निवास  है  यारो ||

सोचना  अब  नहीं  रहा  बस में,
हम    यूँ   बद-हवास   हैं   यारो ||

यूँ   तो   हँस  रहे   हैं  ऊपर  से,
किन्तु ये  दिल  हताश  है  यारो ||

हम हैं भीतर से उतने ही कड़वे,
मुँह में जितनी मिठास  है यारो ||

वक़्त का ये वो मोड़ है जिस पर,
दर्द   ही   आस-पास   है   यारो ||


रचनाकार - अभय दीपराज

GHAZAL - 14

                     ग़ज़ल

आज  आशा  के  सितारे,  छिप  गए  आकाश में |
घुट  रही  है  ज़िन्दगी  की  साँस, सड़ती लाश में ||

आदमी  पर  पाशविकता  का  शिकंजा  यूँ कसा,
जिस तरह अजगर जकड़ता है किसी को पाश में ||

हँस  रहे 
हैं हम  छिपाने  के  लिए  गम - दर्द को,
किन्तु ये गम घुल गया है हर किसी उच्छवास में ||

हीन  गुरुता  से  हुए गुरु,  चोर  के 
सिर  ताज  है,
आज रक्षक बन के  भक्षक,  डस  रहे  आवास  में ||


बेच  कर  इंसानियत  हम,   हो  गए  यूँ  जानवर,
खून  का  व्यापार  है,  हर वास और अधिवास में ||

दोस्ती  में  दुश्मनी  से,  आज  खतरा  बढ़  गया,
अब तो बस केवल ज़हर है, हास और परिहास में ||

हमने चाहा देव  बनना,  किन्तु  दानव  बन  गए,
घुन  लगा यूँ आदमी की आश 
और अभिलाष में ||

फिर वही युग आ गया है,  धर्म  के  एक युद्ध का,
राज्य  है  धृतराष्ट्र  का  और  धर्म  है  वनवास में ||

सत्यता और धर्म ही बस,  आज  तो  हथियार  है,
जो हमें ले जाएगा
अब,  नाश  से  अ-विनाश  में ||
 
                  रचनाकार - अभय दीपराज

GHAZAL - 13

                 ग़ज़ल

आजकल  कुर्सी  पे  जो  है,   शाह   है |
उसके  ताक़त  की,  न  कोई  थाह  है ||

पास  है  अधिकार, तो   खोलो   जुबां,
वरना, मत बोलो, जो दिल की चाह है ||

आज  तो  आराध्य  बस,  तलवार  है,
प्यार  और  इंसानियत  तो,  आह  है ||

कह रहा है युग, कि - उनका नाश हो,
जिनका पथ आदर्श की,
कोई  राह  है ||

आज के युग - धर्म  की  यह  जान है,
आदमी   को   आदमी    से   डाह   है ||


    रचनाकार - अभय दीपराज

Thursday, October 21, 2010

GHAZAL - 12

                           ग़ज़ल

कहती है मुझे पागल दुनिया,  मैं भटका  हुआ  इंसान  जो  हूँ |
दर्द भरी एक  नज़्म  जो हूँ,  एक  बिना  बिका  ईमान  जो  हूँ ||

वो  वारिस  मुझे  बनाते  हैं,  अपनी  नापाक  तमद्दन  का,
नाराज़ हैं मेरी  फितरत पर , मैं   उनका  भी  अरमान  जो  हूँ ||

वो  मुझको  समझ  कर  के दुश्मन,  बन  बैठे  हैं  मेरे  दुश्मन,
राहों  के  खारों  के  लिये  मैं,  मौत  का  एक  फरमान  जो हूँ ||

कर लूँगा सफ़र मैं मंजिल तक,  हर ठोकर  भी  मैं  सह  लूँगा,
पर, राह नहीं देती दुनिया,  मैं   उसके   लिये   तूफ़ान  जो  हूँ ||

तकदीर से शिकवा कोई नहीं, मालिक से शिकायत है लेकिन,
राही मैं सही,  कोई  बात  नहीं,  पर  राहों  से  अंजान  जो  हूँ ||

                           रचनाकार - अभय दीपराज

GHAZAL - 11

       ग़ज़ल

दुनिया  मुझसे  कतराती  है,  शायद  मैं  पागल  लगता  हूँ |
बच  कर  वो  मुझ  से चलते हैं, मैं उनको काजल लगता हूँ ||

अक्सर  लोगों  ने  मुझको  यूँ ,  नफरत  से भरकर देखा है ,
मैं  सावन  की घटा नहीं हूँ ,  बे - मौसम  बादल  लगता  हूँ ||

मेरे  दिल  के  कुछ  ज़ख्मों  ने,  मुझको लहूलुहान किया है,
इसीलिये मैं कुछ उदास हूँ , और  रोता  सा  कल लगता  हूँ ||

मुझे समझना और समझाना, बहुत बोझ सा लगता है अब,
क्योंकि  इन  दोनों  रूपों  में ,  मैं एक झूठा छल  लगता हूँ ||

मेरी  ये  चुभती  खामोशी,   उस  चुभते  गम  से  बेहतर है,
जिसमें  मैं  गर्जन  करता  सा  मैला - खारा जल लगता हूँ ||

तुम भी मुझ से बच कर रहना,  मैं एक  ज़हरीला  कतरा हूँ ,
इसीलिये तो मैं  दुनिया  को, एक कड़वा सा फल लगता हूँ ||


                         रचनाकार - अभय दीपराज

GHAZAL - 10

                                  ग़ज़ल

गिर  गया  है  आदमी  यूँ  आज  अपनी  ज़ात से |
फिर  रहा  है  हर  कदम पर, वो ज़ुबां से, बात से ||

सत्य  से  अब  हो  गयी  है,  शत्रुता  इंसान  की,
इसलिए, वो  वार  इस  पर  कर  रहा  है, घात से ||

सच, परीक्षा  की  घड़ी  है,  आजकल  ये  धर्म की,
लड़  रहा  है  धर्म  जिसमें, आज  काली  रात  से ||

झूठ  से  और  पाप  से  है,  प्यार  यूँ  इंसान  को,
गूँज  युग  को  दे  रहा  वो, अब इन्हीं नगमात से ||

विश्वविजयी मनुज कल का, यूँ नपुंसक हो गया,
लग  रहा  है  भय उसे  अब,  युद्ध  के  हालात  से ||

आज की यह शान्ति, कल की क्रांति का संकेत है,
जन्म  जो  लेगी,  पराजित पक्ष  के  प्रतिघात से ||


               रचनाकार - अभय दीपराज